संसद द्वारा पारित नागरिकता कानून हमारी संवैधानिक जवाबदेही

पाकिस्तान (Pakistan) और बांग्लादेश (Bangladesh) में इस्लामी कट्टरवाद को मिली छूट से त्रस्त हिंदू (Hindu) जब जान बचा कर धर्मनिरपेक्ष भारत में आते तो यहां कभी उपेक्षा मिलती और कभी तिरस्कार. एक तरफ हत्या, दुष्कर्म, अपहरण और जबरन धर्मांतरण की तलवार लटकती तो दूसरी तरफ भारत में जटिल कानूनी प्रक्रिया या कैंपों में नजरबंदी

Source – News18

By – नवरंग

 

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 यानी सिटिज़नशिप अमेंडमेंट बिल राज्यसभा से पास हो गया. राज्यसभा में इस बिल के पक्ष में 125 और विरोध में 105 वोट पड़े, जबकि लोकसभा में इस बिल के पक्ष में 311 वोट, वहीं विरोध में 80 वोट पड़े थे. राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह बिल कानून बन गया है. इस बिल को लेकर दोनों सदनों में व्यापक बहस हुई. सत्ता पक्ष ने इसे एतिहासिक बताया तो कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे काला कानून कहा. कोई इसे हिंदू राष्ट्र की ओर कदम बढ़ाने की बात कह रहा है तो कोई मुसलमानों के साथ हो रहे कथित भेदभाव को लेकर सरकार को घेरता दिखाई दिया. दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात रखने के लिए संविधान का हवाला देते दिखे. होना भी यही चाहिए कि लोकतंत्र में संविधान की संप्रभुता बनी रहे तभी देश की एकता अखंडता बनी रह सकती है. इसलिए जरूरी है कि बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की नागरिकता के विषय में क्या राय है और देश के विभाजन का स्वरूप क्या था, उसे समझा जाए.

बंटवारे में बाबा साहब ने क्या कहा
शुरू करते हैं बाबा साहब की बातों और उनके द्वारा लिखित संविधान से. संविधान के प्रारंभिक शब्द ‘इंडिया दैट इज भारत…’ भारतीय गणतंत्र को राष्ट्र-राज्य की मान्यता देते हैं. राष्ट्र-राज्य वह अवधारणा है जिसमें राज्य पुरातन सभ्यता और सांस्कृतिक पहचान का उत्तराधिकारी होता है और उसके ऊपर पुरातन पहचान को बनाए रखने का उत्तरदायित्व होता है. इसी उत्तरदायित्व के पालन में नागरिकता विधेयक द्वारा पड़ोस में प्रताड़ित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी एवं ईसाई धर्मावलंबियों को राहत देना भारतीय संघ की नैतिक एवं संवैधानिक बाध्यता है. बाबा साहब आंबेडकर ने अपनी किताब पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया में विभाजन के कई महत्वपूर्ण अनछुए सवाल उठाए हैं. डॉ आंबेडकर ने कहा था जबतक पाकिस्तान से एक-एक हिन्दू भारत वापस नहीं आ जाएगा तबतक विभाजन की प्रक्रिया शायद ख़त्म नहीं होगी. तो क्या आंबेडकर जानते थे जो गरीब पिछड़े, अनुसूचित जाति के हिन्दुओं को हम पाकिस्तान में छोड़ आए हैं वह इस्लामिक पाकिस्तान से एक दिन वापस जरूर भारत में शरण लेंगे. बाबा साहब को शायद इस बात का भान था कि जिन्ना ने भारत-पाकिस्तान का विभाजन कराते वक्त भले ही यह कहा हो पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क न होकर धर्मनिरपेक्ष मुल्क होगा. लेकिन शायद ही उसके बातों पर किसी को भरोसा रहा हो और बाबा साहब की आशंका इस बात की तस्दीक भी करती है. ऐसे में आज उसके नागरिकता पर सवाल क्यों है जिसे बताये बगैर हमने हजारों साल के इस देश को दो टुकड़े करने को स्वीकार कर लिया था.

आज नागरिकता संशोधन विधेयक की चर्चा के साथ यह पूछना लाजिमी है कि क्या भोले-भाले गरीब, अनपढ़ जनता को क्या इस विभाजन से कुछ लेना देना था? क्या 14 अगस्त 1947 को उन्हें पता था कि हिंदुस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर पाकिस्तान के रूप में हो गया है. क्या उन्हें पता था वह पाकिस्तान जिसे जिन्ना ने सेक्युलर नेशन कहा था इस्लामिक रिपब्लिक हो जाएगा?

नेहरू-लियाकत समझौता
देश के बंटवारे के बाद पलायन की समस्या की शुरुआत उस समय हुई जब दिसंबर 1949 में भारत पाकिस्तान के आर्थिक संबंध टूट गए. दस लाख लोगों ने दोनों देशों की सीमा पार की. इसके बाद आठ अप्रैल 1950 को नेहरू-लियाकत समझौता हुआ. तय हुआ कि दोनों देश अपने यहां के अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करेंगे. इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि जो भागकर आए हैं उन्हें लौटकर अपनी संपत्ति बेचने का अधिकार होगा, अपहृत औरतों को लौटाना होगा और जबरन कराया गया धर्म परिवर्तन अमान्य किया जाएगा, लेकिन कुछ ही महीने बाद पाकिस्तान से दस लाख हिंदू भागकर भारत आ गए.


भूल का देर से हुआ प्रायश्चित

पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरवाद को मिली छूट से त्रस्त हिंदू जब जान बचाकर धर्मनिरपेक्ष भारत में आते तो यहां कभी उपेक्षा मिलती और कभी तिरस्कार. एक तरफ हत्या, दुष्कर्म, अपहरण और जबरन धर्मातरण की तलवार लटकती तो दूसरी तरफ भारत में जटिल कानूनी प्रक्रिया या कैंपों में नजरबंदी का खौफ सताता. इन देशों में उत्पीड़न झेल रहे हिंदू, बौद्ध या सिखों ने बंटवारे की मांग नहीं की थी. बंटवारा उन पर थोपा गया था. 1947 से पाकिस्तान और फिर 1971 के बाद बांग्लादेश में चल रहा जातिसंहार बंटवारे की त्रासदी का ही विस्तृत संताप है. नागरिकता विधेयक इस भूल का देर से हुआ प्रायश्चित है. लेकिन आज जब 70 साल पुरानी गलतियों को सुधारने की पहल तेज हुई है तो उसे फिर हिन्दू मुस्लिम की बहस में उलझाने की कोशिशे भी तेज हुई है. नागरिकता संशोधन विधेयक विशिष्ट परिस्थितियों से उत्पन्न मानवीय संकट का प्रतिउत्तर है. यदि इतनी बड़ी विभीषिका से प्रभावित लोगों के लिए विशिष्ट भेद के अंतर्गत कानून बनाने का तर्कसंगत आधार नहीं माना जाएगा तो फिर किसे माना जाएगा? इसलिए पाकिस्तान ,बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न व अत्याचार के शिकार हुए अल्पसंख्यक हिन्दू ,सिख बौद्ध ,जैन ,पारसी ,ईसाई भारतीय विस्थापितों को नागरिकता मिलेगी’.

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