हिंदुओं को मिलने जा रही राहत वोट बैंक के सौदागरों को मंज़ूर नहीं !

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दिनांक 05-दिसंबर-2019                                                                                                                                                                                                                                                                                                 

15 अगस्त 1947 के दिन तक पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी उसकी कुल आबादी का 11 प्रतिशत थी, जो अब 2 प्रतिशत से कम है. बंगलादेश जो उस समय पूर्वी पाकिस्तान था, वहां हिंदुओं की आबादी कुल आबादी का 28 प्रतिशत थी, जो आज 8 प्रतिशत है. इन दोनों देशों के ये करोड़ों हिंदू कहां गए ? जवाब है- मार दिए गए, भगा दिए गए, या जबरदस्ती मुसलमान बना दिए गए. सनातनी, सिख, पारसी, ईसाई… किसी को नहीं छोड़ा गया. हत्या अपहरण, बलात्कार, रिसालत-ए-रसूल क़ानून (ईश निंदा), उनकी लड़कियों और बच्चियों का अपहरण- बलात निकाह- मतांतरण, संपत्ति का लूटा जाना, डर के साए में बीतने वाली ज़िल्लत भरी जिन्दगी, बेगारी आदि उनकी नियति बन गई. अपहरण, फिरौती, नरसंहार से आतंकित दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर जी रहे ये लोग, दो तिहाई सदी तक विश्व पटल पर अनसुनी आवाज बने रहे हैं. उन्होंने ये सब झेला, और झेल रहे हैं क्योंकि वो अपने देश के उस हिस्से में रहते थे, जिसे काटकर अलग करके, एक इस्लामी देश बना दिया गया. जो भारत आ सके वो बच गए, जो वहीँ फंसकर रह गए उनका जीवन नरक बन गया. हजारों सालों से जिस धरती पर वो रह रहे थे, वहां वो पराए हो गए. उनकी शादियां अवैध हो गईं, क्योंकि वो इस्लामी रिवाज़ से नहीं हुईं थी. उनकी अपनी जमीनों पर वो बँधुआ बन गए. सब तरफ उनके लिए दरवाज़े बंद थे. तबसे भाग-भागकर, छिपते-छिपाते वो भारत आते रहे हैं. पिछले 70 सालों से पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के हिस्सों से ये पलायन जारी है. लेकिन ज़िंदगी और आशा की तलाश में जब वो भारत आते तो छद्म ‘सेकुलरिज्म’ के हाथों बंधक क़ानून उन्हें घुसपैठिया मान लेता. वो सब सहते और यही कहते कि “मर जाएंगे लेकिन पाकिस्तान वापस नहीं जाएंगे.” आखिरकार मोदी सरकार ने उनके लिए क़ानून में संशोधन करने का प्रावधान किया. नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 इन लोगों के साथ पिछले 70 सालों से हो रहे अन्याय का अंत है.
‘सेकुलर’ सियासतदानों की बेदर्दी –
‘सेकुलरिज्म’ का दम भरने वाले नेताओं और दलों ने इस विधेयक को लटकाने की तैयारी शुरू कर दी है. इसे लेकर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल हंगामे की तैयारी में हैं. वो बयान दे रहे हैं कि ये बिल मुस्लिम विरोधी है, क्योंकि इसमें पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदू, पारसी, बौद्ध, जैन और ईसाई शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है, वहाँ से आने वाले मुस्लिमों को नहीं. सब कुछ जानते बूझते वोटबैंक के लिए की जा रही ये बयानबाजी बेहद आपत्तिजनक है. कांग्रेस ने इस पर बोलने के लिए नेताओं का चुनाव चुनावी गणित के हिसाब से किया है. अपने ऊटपटांग बयानों के लिए जाने जाने वाले कांग्रेस के अधीररंजन चौधरी इस बिल को लेकर लोकसभा में मुखर हैं. वो बंगाल से आते हैं, जहां बंग्लादेश से आए अवैध प्रवासी कई निर्वाचन क्षेत्रों में निर्णायक स्थिति में हैं, और उनके वोटों को लेकर ममता, कम्युनिस्ट और कांग्रेस में घमासान है. दूसरे कांग्रेस नेता शशिथरूर संसद के बाहर बातों के ढेर लगा रहे हैं. थरूर केरल से आते हैं, जहां मुस्लिम आबादी चुनाव के परिणाम को असरदार रूप से प्रभावित करती है. ओवैसी की सियासत भी मचल रही है.
क्या है ये संशोधन विधेयक
जैसा कि इसके नाम से जाहिर है, इस विधेयक द्वारा 1955 के नागरिकता क़ानून (सिटीजनशिप एक्ट) में संशोधन या सुधार किया जा रहा है. अभी भारत में आने वाले इन शरणार्थियों को नागरिकता प्राप्त करने के लिए 11 साल इंतज़ार करना पड़ता है, इस विधेयक में इस अवधि को घटाकर 1 से 6 साल किया गया है. याने नागरिकता मिलने के लिए लंबा इंतज़ार और प्रशासनिक सख्ती से निजात मिल सकेगी.
भ्रमजाल के सहारे –
‘यदि आप उन्हें अपने से सहमत नहीं कर सकते, तो उन्हें भ्रमित कर दो.’ की तर्ज पर कांग्रेस नेता थरूर बोले कि ये विधेयक संविधान की मूलभावना के खिलाफ है. इसमें मज़हब के आधार पर भेदभाव किया गया है. कई किताबों के लेखक, दुनियाभर में ‘लेक्चर’ देने वाले थरूर कांग्रेस के बुद्धिजीवियों में शुमार किये जाते हैं. क्या उन्हें पता नहीं है कि इस विधेयक से भारत के मुस्लिम नागरिकों का कोई लेना-देना ही नहीं है? क्या उन्हें पता नहीं है कि भारत का संविधान भारत के नागरिकों के लिए है. और बिल भारत में आने वाले शरणार्थियों के लिए है, और यह, कि भारत सरकार और संसद को यह क़ानून बनाने का पूरा अधिकार है कि किसे नागरिकता दी जाए. थरूर इतने नासमझ नहीं हैं कि ये ज़रा सी बात न समझ सकें. विधेयक का विरोध करने वाले नेता और दल चाहते हैं कि पीड़ित शरणार्थी और अवैध रूप से भारत में आने वालों में कोई फर्क न किया जाए. क्या ऐसा संभव है? क्या ऐसा उचित है? शरणार्थी तो उसे ही माना जाएगा न जो अपनी जान और इज्ज़त बचाने के लिए बेबस होकर शरण लेने भारत आया है. लेकिन इसमें अड़ंगे लगाने, इसे रोकने की कोशिश की जा रही है. क्या “जो भी पाकिस्तान-बंग्लादेश से आएगा उसे भारत की नागरिकता दे दी जाएगी” ऐसा कानून बनाया जा सकता है? वास्तव में ऐसी माँग ही संविधान की मूलभूत बातों के खिलाफ है.
वोट बैंक के चक्कर में….
गट्ठा वोट के चक्कर में देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग खेल जारी हैं. बंगाल में ममता बनर्जी और उनके मंत्री राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर खुलेआम केंद्र सरकार को चुनौती देते घूम रहे हैं कि इसे लागू करके दिखाएँ. वहीँ पूरे बंगाल में जमीनी स्तर पर झूठ फैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार बंग्लादेश से जान बचाकर आए हिंदुओं को भी जबर्दस्ती बंग्लादेश भेजने की तैयारी कर रही है. पश्चिम बंगाल से देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने के लिए पहुंचने वाले ऐसे लोगों से बात करके देखें, तो वो इसकी पुष्टि करेंगे. बोली और बातें इलाका बदलने के साथ बदल जाती हैं. मुस्लिम नागरिकों के बीच दुष्प्रचार किया जा रहा है कि एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक भारत के मुस्लिमों के खिलाफ एक षडयंत्र है.
असम में जो बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठ पर मौन बने रहे, और एनआरसी का विरोध करते रहे ऐसे तथाकथित सेकुलर अब नागरिकता संशोधन विधेयक को असम के खिलाफ बता रहे हैं. कुछ लोगों ने मौक़ा देखकर फिर से रोहिंग्याओं का मुद्दा उछालने की कोशिशें तेज कर दी हैं कि जब हिंदू, पारसी, बौद्ध, जैन और ईसाइयों को नागरिकता दे जा रही है तो रोहिंग्याओं को क्यों नहीं. मुद्दे को भटकाने के लिए इस तथ्य को साजिश के तहत दरकिनार कर दिया गया है, कि नागरिकता संशोधन विधेयक भारतीय मूल के उन लोगों को लक्ष्य करके तैयार किया गया है, जो 1947 में भारत विभाजन के कारण त्रासदी का शिकार हुए हैं.

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